
In an interview with Times of India, Yale historian Sunil Amrith discusses his new book 'The Burning Earth', which argues that elite pursuit of luxury and accumulation has disproportionately driven environmental destruction…
टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ एक साक्षात्कार में येल इतिहासकार सुनील अम्रित ने अपनी नई पुस्तक ‘द बर्निंग अर्थ’ पर चर्चा की है। उनका तर्क है कि पिछले दो शताब्दियों में कुलीन वर्ग द्वारा विलासिता और धन संचय की होड़ ने पर्यावरण को असमान रूप से नष्ट किया है। इन्फोसिस पुरस्कार, मैक्आर्थर फेलोशिप और टॉयन्बी पुरस्कार के विजेता अम्रित ने अपने वैश्विक इतिहास का आधार एशिया को बनाया है जो अधिकांश मानवता का घर है। पुरा जलवायु विज्ञान और अन्य विषयों का सहारा लेकर उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि कैसे प्रवासन, बागानों और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं ने ग्रह का स्वरूप बदल दिया है। उनका कहना है कि जलवायु संकट को समझने के लिए पर्यावरणीय असमानता को समझना अनिवार्य है हालांकि उनकी किताब किसी स्पष्ट खलनायक का नाम लेने से बचती है।

ग्रहीय संकट के चालक के रूप में कुलीन वर्ग की विलासिता पर अम्रित का ध्यान उन विमर्शों का एक जरूरी सुधार है जो ग्लोबल साउथ में जनसंख्या वृद्धि को दोष देते हैं। फिर भी पुस्तक यह बताने से कतराती है कि आज कौन से संभ्रांत वर्ग सबसे अधिक जिम्मेदारी रखते हैं और क्या उनके संचय को चुनौती दी जा रही है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या भारत का तेजी से बढ़ता कुलीन वर्ग एक बाध्यकारी कार्बन बजट स्वीकार करता है जो उसके उपभोग को सीमित करता है या फिर वह गरीबों पर अपनी लागत का बोझ डालना जारी रखता है।
स्रोत: timesofindia.indiatimes.com
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