
Gynaecologists in India report an uptick in women visiting clinics for vaginal itching and discharge during the monsoon season, though they caution this is a clinical trend rather than a proven seasonal…
बेंगलुरु के बोन एंड बर्थ क्लिनिक और रेनबो हॉस्पिटल की डॉ. गाना श्रीनिवास के अनुसार भारत में स्त्री रोग विशेषज्ञ मानसून के दौरान वजाइनल खुजली और डिस्चार्ज से पीड़ित महिलाओं की बढ़ती संख्या देख रहे हैं। उनका कहना है कि यह कोई मौसमी महामारी नहीं बल्कि एक क्लिनिकल चलन है। नमी और गीले कपड़े संवेदनशील महिलाओं में कैंडिडा के बढ़ने का कारण बनते हैं, लेकिन मधुमेह, एंटीबायोटिक का उपयोग और गर्भावस्था जैसे कारक अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्वयं निदान करना अविश्वसनीय है क्योंकि लक्षण बैक्टीरियल वेजिनोसिस और डर्मेटाइटिस से मेल खाते हैं। दक्षिण भारत के एक अध्ययन में पाया गया कि केवल खुजली या डिस्चार्ज के आधार पर कैंडिडिआसिस की सटीक पहचान मुश्किल है। बचाव के लिए गीले कपड़े तुरंत बदलना, सूती अंडरवियर पहनना और ब्लड शुगर नियंत्रित रखना जरूरी है। भारत में मानसून और वजाइनल कैंडिडिआसिस को जोड़ने वाला कोई ठोस राष्ट्रीय डेटा नहीं है, इसलिए डॉक्टर इसे केवल लक्षणों में बढ़त के रूप में देख रहे हैं।

मीडिया अक्सर ‘मानसून यानी यीस्ट इन्फेक्शन’ का सरल नैरेटिव पेश करता है, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा जटिल है। हर मामले को बारिश से जोड़ना मधुमेह, एंटीबायोटिक और गर्भावस्था जैसे गहरे चिकित्सीय कारणों को नजरअंदाज करना है। खतरा यह है कि महिलाएं खुद से निदान करके एंटीफंगल क्रीम का गलत इस्तेमाल कर सकती हैं, जिससे सही उपचार में देरी होती है। जब तक ठोस भारतीय मौसमी डेटा सामने नहीं आता, तब तक केवल नमी को दोष देना ही उचित है, बारिश को नहीं।
स्रोत: timesnownews.com
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