
The Bombay High Court on August 13 dismissed petitions by the Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) challenging a 2020 order that community health volunteers (CHVs) are entitled to minimum wages under the Minimum…
बंबई उच्च न्यायालय ने 13 अगस्त को बृहन्मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों (सीएचवी) को न्यूनतम वेतन देने के आदेश को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति संदीप मारणे ने टिप्पणी की कि हालांकि इन कर्मियों को स्वयंसेवक कहा जाता है लेकिन वे व्यावहारिक रूप से निकाय के कर्मचारी के रूप में काम करते हैं। वे पारिश्रमिक के लिए निर्धारित ड्यूटी करते हैं और निश्चित समय पर रिपोर्ट करने के साथ ही चिकित्सा कर्मचारियों के निर्देशों का पालन करते हैं।
अदालत ने गौर किया कि सीएचवी करीब 38 वर्षों से बीएमसी के लिए काम कर रहे हैं और स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने के साथ ही विशेषकर झुग्गी बस्तियों में स्वास्थ्य केंद्रों को स्थानीय समुदायों से जोड़ रहे हैं। अदालत ने बीएमसी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पांच घंटे के काम के लिए 14,000 रुपये का मासिक मानदेय उसे इस अधिनियम से छूट देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला सीएचवी को स्थायी होने या अतिरिक्त सेवा लाभ का अधिकार नहीं देता है बल्कि यह केवल अधिसूचित न्यूनतम वेतन का हक देता है।
बीएमसी का यह तर्क कि स्वयंसेवक कानून के तहत कर्मचारी नहीं हो सकते, दशकों से सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्य के लिए उचित वेतन देने से बचने का एक बहाना लगता है। अदालत ने सही ढंग से नाम के बजाय काम की प्रकृति पर ध्यान केंद्रित किया है जो कि व्यवस्थित और नियमित है। अब सवाल यह है कि क्या बीएमसी फैसले को चुनौती देगी या इसका पालन करेगी। असली सवाल यह है कि यदि निगम ठेके के कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन दे सकता है तो उन महिलाओं को इससे वंचित क्यों रखा जाए जिन्होंने 38 वर्षों तक झुग्गी बस्तियों के समुदायों की सेवा की है?
स्रोत: freepressjournal.in
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