
The Himachal Pradesh High Court has held that Section 50 of the NDPS Act does not allow any officer, including the Gazetted Officer, to give an accused a fresh or third option…
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 किसी भी अधिकारी को, जिसमें राजपत्रित अधिकारी भी शामिल हैं, आरोपी को तलाशी के लिए नया या तीसरा विकल्प देने की अनुमति नहीं देती है। आरोपी को मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी के समक्ष तलाशी लेने का वैधानिक विकल्प पहले ही मिल चुका होता है। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने वर्ष 2013 में कुल्लू में राम लाल से 350 ग्राम चरस बरामदगी के मामले में उसकी दोषमुक्ति के खिलाफ राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

अदालत ने गौर किया कि राम लाल द्वारा राजपत्रित अधिकारी के समक्ष तलाशी का विकल्प चुनने के बाद उसे पटलीकुहल के बजाय 12 किमी दूर मनाली ले जाया गया जबकि वहां से 4-5 किमी की दूरी पर ही राजपत्रित अधिकारी उपलब्ध थे। पीठ ने पाया कि निचली अदालत की दोषमुक्ति कई खामियों पर आधारित थी जिनमें स्वतंत्र गवाहों का न होना, प्रमुख पुलिस गवाहों का परीक्षण न करना और बरामदगी की तस्वीरों का समय व स्थान को लेकर अभियोजन पक्ष के दावे से विरोधाभासी होना शामिल है।
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने उस प्रक्रियात्मक खामी को सही ढंग से दूर किया है जो एक महत्वपूर्ण अधिकार को खत्म कर सकती थी। पुलिस के कुछ बयानों का तर्क है कि आरोपी अक्सर तलाशी को टालने के लिए विकल्प बदलते हैं लेकिन कानून में केवल दो ही विकल्प देने का ठोस कारण है ताकि पूरी तरह से स्वतंत्र गवाह सुनिश्चित हो सके। अब असली परीक्षा यह है कि क्या जांच एजेंसियां अपने अधिकारियों को अवैध तीसरा विकल्प देना बंद करने के लिए प्रशिक्षित करेंगी या राज्य अपनी खुद की प्रक्रियात्मक गलतियों से हुई दोषमुक्ति के मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ता रहेगा।
स्रोत: livelaw.in
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