
The Jammu & Kashmir and Ladakh High Court held that a Judicial Magistrate cannot simultaneously pursue recovery of maintenance through the police after issuing a levy warrant to the District Collector under…
जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 421(1)(b) के तहत जिला कलेक्टर को लेवी वारंट जारी करने के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट पुलिस के जरिए समानांतर रूप से भरण-पोषण की वसूली नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति राहुल भारती ने टिप्पणी की कि एक बार कलेक्टर को वारंट जारी होने के बाद अदालत की भूमिका सीमित हो जाती है और वसूली की प्रक्रिया भू-राजस्व के बकाए की तरह आगे बढ़ती है। यह फैसला जिला कलेक्टर शिशिर गुप्ता की उस याचिका पर आया जिसमें उन्होंने एक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी थी। मजिस्ट्रेट ने कलेक्टर को वारंट देने के बाद पुलिस को भी अलग से वारंट जारी कर दिया था। अदालत ने इस समानांतर वसूली को कानूनी रूप से आधारहीन माना।

आमतौर पर न्यायपालिका और नौकरशाही के बीच टकराव की खबरें सामने आती हैं लेकिन उच्च न्यायालय का यह फैसला इस दोषारोपण की राजनीति को खत्म करता है। कानून स्पष्ट है कि वारंट जारी होने के बाद वसूली का अधिकार कलेक्टर का है और मजिस्ट्रेट का समानांतर वारंट कानूनी रूप से गलत था। अब असली परीक्षा यह है कि क्या कलेक्टर तत्परता से काम करेंगे ताकि अदालत को बार-बार हस्तक्षेप न करना पड़े। यदि ऐसा होता है तो यह फैसला भरण-पोषण की मांग करने वाली महिलाओं और बच्चों के लिए प्रक्रियात्मक बाधाओं को काफी कम करेगा।
स्रोत: livelaw.in
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