
Census 2027 will record the caste of every respondent, marking the first such exercise since Independence, The Hindu reports. Its questionnaire expands to 40 questions from 29 in Census 2011 and will…
आजादी के बाद पहली बार भारत की जनगणना में जाति की गणना को शामिल किया जा रहा है जिससे तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार समर्थकों का तर्क है कि सामाजिक न्याय सटीक प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी नीतियों के लिए यह कदम अनिवार्य है जबकि आलोचकों का दावा है कि यह वोट बैंक की राजनीति का जरिया बन सकता है।
जाति डेटा एकत्र करने का तरीका विवाद का केंद्र बन गया है और दल एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं कि इस कवायद का इस्तेमाल जाति आधारित वोट बैंक को एकजुट करने के लिए किया जा रहा है। सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस डेटा का उपयोग आरक्षण कोटा को संशोधित करने के लिए किया जाएगा या इसे केवल नीतिगत उद्देश्यों तक सीमित रखा जाएगा।
दो नैरेटिव हावी हैं। एक का दावा है कि जाति जनगणना ही वास्तविक अभावों को मापने और आरक्षण की सीमा तय करने का एकमात्र तरीका है। वहीं दूसरा इसे चुनाव से पहले मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की एक सोची-समझी चाल बताता है। दोनों पक्ष आंशिक रूप से सही हैं। भारत को नए सामाजिक-आर्थिक डेटा की सख्त जरूरत है लेकिन जाति के इर्द-गिर्द मौजूदा राजनीतिक माहौल में इस तरह की कवायद को संदेह से मुक्त होकर करना लगभग असंभव है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या सरकार कच्चे डेटा को सार्वजनिक करती है और चुनावी बयानबाजी के बजाय इसे सबूत आधारित नीति बनाने के लिए इस्तेमाल करने का संकल्प लेती है। यदि आंकड़ों को गुप्त रखा गया या चयनात्मक रूप से जारी किया गया तो मंशा कुछ भी हो विश्वास खो जाएगा।
स्रोत: timesnownews.com
यह खबर ऊपर दिए गए स्रोत से एआई द्वारा तैयार की गई है।