
Former Supreme Court judge Justice Deepak Verma and two retired High Court judges have moved the Supreme Court against a Rajasthan High Court order criticising their arbitral tribunal as “lethargic” and reducing…
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक वर्मा और दो सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है जिसमें उनके आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल को सुस्त करार देते हुए देरी के कारण फीस में कटौती की गई थी। यह मामला चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची तथा जस्टिस वी मोहना की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है।

यह विवाद एचसीएल इंफोसिस्टम्स और राजस्थान की तीन बिजली वितरण कंपनियों के बीच 2009 के अनुबंधों को लेकर है। हाईकोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता ने कानूनी समय सीमा का उल्लंघन किया है और इसमें 160 से अधिक बैठकें हुई हैं तथा खर्च 13 करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया है। अदालत ने 31 मई 2026 से जयपुर में प्रतिदिन सुनवाई कर 45 दिनों के भीतर काम पूरा करने का निर्देश दिया था। ट्रिब्यूनल ने इसके पीछे तकनीकी जटिलता, 22 गवाहों, व्यापक रिकॉर्ड और कोविड 19 के कारण हुए व्यवधान का हवाला दिया था।
इस मामले को केवल न्यायिक आलोचना और ट्रिब्यूनल की गरिमा के टकराव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। लंबी मध्यस्थता से वास्तविक खर्च बढ़ता है लेकिन जटिल रिकॉर्ड और गवाहों के साक्ष्यों के लिए समय की आवश्यकता होती है। प्रति सत्र 7.5 लाख रुपये की फीस और लगभग 13 करोड़ रुपये का खर्च हाईकोर्ट की चिंता को जायज बनाता है जबकि ट्रिब्यूनल के स्पष्टीकरण को भी उचित सुनवाई मिलनी चाहिए। फीस कटौती और 45 दिनों में काम पूरा करने के निर्देश पर सुप्रीम कोर्ट का रुख एक वास्तविक परीक्षा होगी।
स्रोत: livelaw.in
यह खबर ऊपर दिए गए स्रोत से एआई द्वारा तैयार की गई है।