
A Times Now opinion article argues that people displaced during the 1947 Partition should not be described simply as refugees. It says they moved within undivided India before Partition created India and…
टाइम्स नाउ के एक ओपिनियन लेख में तर्क दिया गया है कि 1947 के विभाजन के दौरान विस्थापित हुए लोगों को केवल शरणार्थी नहीं कहा जाना चाहिए। लेख का कहना है कि उन्होंने अविभाजित भारत के भीतर ही प्रवास किया था क्योंकि विभाजन के बाद ही भारत और पाकिस्तान का निर्माण हुआ। बाद में इन्होंने दिल्ली की लाजपत नगर, तिलक नगर और पंजाबी बाग जैसी कॉलोनियों में अपना जीवन फिर से बसाया।
यह लेख शरणार्थी शिविरों में पानी, कपड़ों और बच्चों के लिए दूध जैसी आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी को याद करता है। साथ ही, यह उन विस्थापित परिवारों को श्रेय देता है जिन्होंने छोटे-मोटे काम और रेहड़ी-पटरी के जरिए अपनी मेहनत से सफल व्यवसाय खड़े किए। लेख का मानना है कि उनके संघर्ष के साथ ही उनके जुझारूपन और योगदान को भी याद रखा जाना चाहिए।
लेख का यह पक्ष सही है कि लाखों विस्थापित लोगों को केवल असहाय पीड़ित नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन इसका तर्क बहुत अधिक निरपेक्ष हो जाता है। विभाजन के बचे लोगों ने एक नई अंतरराष्ट्रीय सीमा पार की थी और बाद में मेहनत से जीवन खड़ा करने के बावजूद उनमें से कई सरकारी राहत पर निर्भर थे। उन्हें शरणार्थी कहना उस कानूनी और मानवीय वास्तविकता को दर्ज करता है, जबकि उन्हें साथी नागरिक कहना उनकी भारतीय पहचान को स्वीकार करना है। सही स्मरण वही है जो इन दोनों सच्चाइयों को एक साथ रखे, न कि शब्दावली को राष्ट्रभक्ति की परीक्षा बना दे।
स्रोत: timesnownews.com
यह खबर ऊपर लिंक किए गए स्रोत से एआई द्वारा तैयार की गई है।