
The Allahabad High Court has ruled that a gift deed promising to install an idol in the future does not create a juristic person if the idol is never consecrated or installed.…
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि यदि मूर्ति की प्रतिष्ठा या स्थापना कभी नहीं हुई तो भविष्य में मूर्ति स्थापित करने का वादा करने वाला दान पत्र कोई कानूनी व्यक्ति नहीं बनाता। न्यायालय ने कहा कि देवता के प्रति समर्पण का दावा करने वाले लोगों को उनकी ओर से मुकदमा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार-एक्स ने कहा कि चूंकि कोई मूर्ति स्थापित नहीं की गई, इसलिए मुकदमे की नींव ही समाप्त हो गई।
मामला 1949 के एक दान पत्र से जुड़ा था, जिसमें कैलाश नाथ अग्रवाल को यह शर्त पर जमीन दी गई थी कि वहां भगवान राम की मूर्ति स्थापित की जाएगी। वादियों ने, स्वयं को देवता के अगले मित्र बताते हुए, संपत्ति के कुछ हिस्सों को हस्तांतरित करने के लिए अग्रवाल के उत्तराधिकारियों पर मुकदमा दायर किया। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि न तो कोई मंदिर अस्तित्व में था और न ही कोई मूर्ति, और वे दशकों से खुले तौर पर संपत्ति के मालिक थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि न कोई मंदिर बनाया गया, न कोई पुजारी नियुक्त किया गया, और न ही पूजा की कोई व्यवस्था की गई। अदालत ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को बरकरार रखा कि यह दान पत्र एक व्यक्तिगत उपहार था, न कि कोई धार्मिक न्यास, और संपत्ति हस्तांतरण पर लगाई गई रोक अमान्य थी। Livelaw.in की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने अपील खारिज कर दी, यह पाते हुए कि कोई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न नहीं है और वादियों के पास मुकदमा दायर करने का कोई अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं है।
स्रोत: livelaw.in
यह कहानी उपर्युक्त स्रोत से AI द्वारा संश्लेषित की गई है।